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श्लोक 13.187.12  |
रञ्जयस्व प्रजा: सर्वा: प्रकृती: परिसान्त्वय।
सुहृद: फलसत्कारैरर्चयस्व यथार्हत:॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| समस्त प्रजा को सुखी रखो। मंत्रियों तथा अन्य प्रकृतियों को सुख दो। अपने मित्रों का यथायोग्य आदर करते रहो, उन्हें फल और आतिथ्य प्रदान करो। 12॥ |
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| Keep all the subjects happy. Give solace to ministers and other natures. Keep honoring your friends as per your due respect with fruits and hospitality. 12॥ |
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