श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 186: नित्यस्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम-कीर्तनका माहात्म्य  »  श्लोक 43-47h
 
 
श्लोक  13.186.43-47h 
उत्तरां दिशमाश्रित्य य एधन्ते निबोध तान्॥ ४३॥
अत्रिर्वसिष्ठ: शक्तिश्च पाराशर्यश्च वीर्यवान्।
विश्वामित्रो भरद्वाजो जमदग्निस्तथैव च॥ ४४॥
ऋचीकपुत्रो रामश्च ऋषिरौद्दालकिस्तथा।
श्वेतकेतु: कोहलश्च विपुलो देवलस्तथा॥ ४५॥
देवशर्मा च धौम्यश्च हस्तिकाश्यप एव च।
लोमशो नाचिकेतश्च लोमहर्षण एव च॥ ४६॥
ऋषिरुग्रश्रवाश्चैव भार्गवश्च्यवनस्तथा।
 
 
अनुवाद
अब उत्तर दिशा का आश्रय लेकर उन्नति करने वालों के नाम सुनो- अत्रि, वशिष्ठ, शक्ति, पराशरनन्दन, शक्तिशाली व्यास, विश्वामित्र, भारद्वाज, ऋचीक पुत्र जमदग्नि, परशुराम, उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु, कोहल, विपुल, देवल, देवशर्मा, धौम्य, हस्तिकाश्यप, लोमश, नचिकेत, लोमहर्षण, उग्रश्रवा ऋषि और भृगुनन्दन। च्यवन॥ 43-46 1/2॥
 
Now listen to the names of those who progress by taking refuge in the north direction - Atri, Vashishtha, Shakti, Parasharanandan, powerful Vyas, Vishwamitra, Bharadwaj, Richika's son Jamadagni, Parashuram, Uddalaka's son Shwetaketu, Kohal, Vipul, Deval, Devsharma, Dhaumya, Hastikashyap, Lomash, Nachiket, Lomaharshan, Ugrashrava Rishi and Bhrigunandan. Chyavan॥ 43-46 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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