युधिष्ठिर उवाच
किं श्रेय: पुरुषस्येह किं कुर्वन् सुखमेधते।
विपाप्मा स भवेत् केन किं वा कल्मषनाशनम्॥ २॥
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "पितामह! यहाँ मनुष्य के कल्याण का साधन क्या है? उसे क्या सुख देता है? कौन-सा कर्म उसके पापों को दूर करता है? अथवा कौन-सा कर्म उसके पापों का नाश करता है?"
Yudhishthira said, "Grandfather! What is the means of man's welfare here? What makes him happy? Which action removes his sins? Or which action destroys his sins?"