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mahabharat 13.185.9: चाहे कोई कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो, वह किसी का हाथ पकड़कर उसे धर्म का पालन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता; परन्तु वह उसे नियमानुसार तथा लोकभय का बहाना बनाकर धर्म का पालन करने के लिए कह सकता है।॥9॥   |   mahabharat अध्याय 13.185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.185.9 
न तु कश्चिन्नयेत् प्राज्ञो गृहीत्वैव करे नरम्।
उच्यमानस्तु धर्मेण धर्मलोकभयच्छले॥ ९॥
 
 
अनुवाद
चाहे कोई कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो, वह किसी का हाथ पकड़कर उसे धर्म का पालन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता; परन्तु वह उसे नियमानुसार तथा लोकभय का बहाना बनाकर धर्म का पालन करने के लिए कह सकता है।॥9॥
 
No matter how intelligent a person is, he cannot force a person to follow Dharma by holding his hand; but he can tell him to follow Dharma as per the rules and by using the excuse of fear of the people.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)