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mahabharat 13.185.7: धर्म का स्वरूप प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी है, काल उसकी सब ओर से रक्षा करता है। अतः अधर्म में धर्म को फैलाने या स्पर्श करने की भी शक्ति नहीं है। 7.   |   mahabharat अध्याय 13.185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.185.7 
स्प्रष्टुमप्यसमर्थो हि ज्वलन्तमिव पावकम्।
अधर्म: संततो धर्मं कालेन परिरक्षितम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
धर्म का स्वरूप प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी है, काल उसकी सब ओर से रक्षा करता है। अतः अधर्म में धर्म को फैलाने या स्पर्श करने की भी शक्ति नहीं है। 7.
 
The nature of Dharma is as radiant as a blazing fire, time protects it from all sides. Therefore, Adharma does not have the power to spread and even touch Dharma. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)