श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.185.3 
तदा त्वस्य भवेद् बुद्धिर्धर्मार्थस्य प्रदर्शनात्।
तदाश्वसीत धर्मात्मा दृढबुद्धिर्न विश्वसेत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जब कोई व्यक्ति धर्म के परिणामों को देखकर धर्म की श्रेष्ठता के प्रति आश्वस्त हो जाता है, तभी धर्म में उसकी आस्था बढ़ती है और तभी उसका मन धर्म में प्रवृत्त होता है। जब तक धर्म में बुद्धि दृढ़ न हो, तब तक कोई भी उस पर विश्वास नहीं करता। 3॥
 
When a person becomes convinced of the superiority of religion after seeing the results of religion, only then does his faith in religion increase and only then does his mind become engaged in religion. Unless the intellect is strong in religion, no one believes in it. 3॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas