|
| |
| |
श्लोक 13.185.15  |
एवं सति न दोषोऽस्ति भूतानां धर्मसेवने।
तिर्यग्योनावपि सतां लोक एव मतो गुरु:॥ १५॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| ऐसी स्थिति में सभी प्राणियों के लिए पृथक्-पृथक् धर्म करने में कोई हानि नहीं है। यह संसार तिर्यग्योनिमा में पड़े हुए पशु-पक्षी आदि योनियों के लिए भी गुरु (कर्तव्यों का निदेशक) है। 15॥ |
| |
| In such a situation, there is no harm in serving religion separately for all living beings. This world is also the Guru (director of duties) for the species like animals, birds etc. lying in Tiryagyonima. 15॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रशंसायां चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मकी प्रशंसाविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६४॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|