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mahabharat 13.185.13: पिताश्री! यदि आप कहते हैं कि धर्म को नित्य माना गया है, तो फिर स्वर्ग आदि अनित्य लोकों की प्राप्ति कैसे होती है? और यदि होती भी है, तो वह नित्य कैसे है? तो इसका उत्तर यह है कि जब धर्म का संकल्प नित्य होता है, अर्थात् जब निष्काम भाव से, अनित्य कामनाओं को त्यागकर धर्म किया जाता है, तब उस समय किया गया धर्म नित्य लोक (नित्य परमात्मा) की प्राप्ति कराता है।॥13॥   |   mahabharat अध्याय 13.185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  13.185.13 
अध्रुवो हि कथं लोक: स्मृतो धर्म: कथं ध्रुव:।
यत्र कालो ध्रुवस्तात तत्र धर्म: सनातन:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! यदि आप कहते हैं कि धर्म को नित्य माना गया है, तो फिर स्वर्ग आदि अनित्य लोकों की प्राप्ति कैसे होती है? और यदि होती भी है, तो वह नित्य कैसे है? तो इसका उत्तर यह है कि जब धर्म का संकल्प नित्य होता है, अर्थात् जब निष्काम भाव से, अनित्य कामनाओं को त्यागकर धर्म किया जाता है, तब उस समय किया गया धर्म नित्य लोक (नित्य परमात्मा) की प्राप्ति कराता है।॥13॥
 
Father! If you say, Dharma is considered eternal, then how does one attain temporary worlds like heaven etc.? And if it does, then how is it eternal? So the answer to this is that when the resolution of Dharma is eternal, that is, when Dharma is performed without any desire, abandoning temporary desires, then the Dharma performed at that time leads to attainment of the eternal world (eternal God).॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)