श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  13.185.11-12 
विशेषेण च वक्ष्यामि चातुर्वर्ण्यस्य लिङ्गत:।
पञ्चभूतशरीराणां सर्वेषां सदृशात्मनाम्॥ ११॥
लोकधर्मे च धर्मे च विशेषकरणं कृतम्।
यथैकत्वं पुनर्यान्ति प्राणिनस्तत्र विस्तर:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
अब मैं चारों वर्णों के लक्षणों का विशेष रूप से वर्णन कर रहा हूँ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - इन चारों वर्णों के शरीर पंचमहाभूतों से बने हैं और सबकी आत्मा एक ही है। फिर भी इनके लौकिक धर्म और वैशिष्ट्य में भेद है। इसका उद्देश्य यह है कि सभी लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए पुनः एकत्व को प्राप्त हों। शास्त्रों में इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। ॥11-12॥
 
Now I am describing the characteristics of the four Varnas in particular. The bodies of the four Varnas - Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shudra - are made up of the five great elements and the soul of all is the same. Even then, there is a difference in their worldly religion and special religion. The purpose of this is that all people, while following their respective religions, should attain unity again. This is described in detail in the scriptures. ॥11-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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