श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 185: भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दु:खकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.185.10 
शूद्रोऽहं नाधिकारो मे चातुराश्रम्यसेवने।
इति विज्ञानमपरे नात्मन्युपदधत्युत॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं शूद्र हूँ, इसलिए ब्रह्मचर्य सहित चारों आश्रमों का पालन करने का मुझे अधिकार नहीं है - शूद्र ऐसा सोचता है, परंतु साधु ब्राह्मण अपने अन्दर छल को आश्रय नहीं देते ॥10॥
 
I am a Shudra and hence do not have the right to practise the four ashrams (hermitages of life) including celibacy - a Shudra thinks so, but the saintly Brahmins do not allow deceit to take shelter within themselves. ॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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