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mahabharat 13.184.9-10h: जिस प्रकार जल पीने से मनुष्य की प्यास बुझती है, उसी प्रकार यदि शिक्षा द्वारा अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति आवश्यक होती, तो कोई भी व्यक्ति शिक्षा की उपेक्षा न करता ॥9 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.184: युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 184: युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  13.184.9-10h 
यथा पिपासां जयति पुरुष: प्राप्य वै जलम्॥ ९॥
इष्टार्थो विद्यया ह्येव न विद्यां प्रजहेन्नर:।
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार जल पीने से मनुष्य की प्यास बुझती है, उसी प्रकार यदि शिक्षा द्वारा अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति आवश्यक होती, तो कोई भी व्यक्ति शिक्षा की उपेक्षा न करता ॥9 1/2॥
 
Just as a person's thirst is quenched by drinking water, in the same way, if it was essential to achieve the desired object through education, then no person would ignore education. 9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)