श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 184: युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.184.14 
यदा प्रमाणं प्रसव: स्वभावश्च सुखासुखे।
दंशकीटपिपीलानां स्थिरो भव युधिष्ठिर॥ १४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! मक्खियाँ, कीड़े और चींटियाँ आदि प्राणियों का स्वभाव, जो अपनी-अपनी योनियों में जन्म लेकर उन्हें सुख-दुःख का अनुभव कराता है, वह उनके अपने कर्मों का कारण है। इस पर विचार करो और शान्त हो जाओ॥ 14॥
 
Yudhishthira! The nature of animals like flies, insects and ants, which are born in their respective species and make them experience happiness and sorrow is the reason for their own karma. Think about this and become calm.॥ 14॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रशंसायां त्रिषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मकी प्रशंसाविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६३ १/२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)