श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 184: युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  13.184.13 
तस्माद् दद्यान्न याचेत पूजयेद् धार्मिकानपि।
सुभाषी प्रियकृच्छान्त: सर्वसत्त्वाविहिंसक:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
इसलिए मनुष्य को स्वयं दान देना चाहिए, दूसरों से भिक्षा नहीं मांगनी चाहिए, पुण्य पुरुषों का पूजन करना चाहिए, अच्छे वचन बोलने चाहिए, सबका उपकार करना चाहिए, शांति से रहना चाहिए और किसी प्राणी को कष्ट नहीं देना चाहिए ॥13॥
 
Therefore one should give charity himself, should not beg from others, should worship the virtuous men, should speak good words, should do good to all, should live with peace and should not harm any living being. ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)