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mahabharat 13.183.58: इसलिए अपने पापों को मत छिपाओ। छिपे हुए पाप बढ़ते हैं। यदि कोई पाप हो जाए, तो उसे संतों को बताना चाहिए। वे उसे शांत कर देंगे ॥ 58॥   |   mahabharat अध्याय 13.183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.183.58 
तस्मात् पापं न गूहेत गूहमानं विवर्धयेत्।
कृत्वा तत् साधुष्वाख्येयं ते तत् प्रशमयन्त्युत॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
इसलिए अपने पापों को मत छिपाओ। छिपे हुए पाप बढ़ते हैं। यदि कोई पाप हो जाए, तो उसे संतों को बताना चाहिए। वे उसे शांत कर देंगे ॥ 58॥
 
Therefore do not hide your sins. Sins that are hidden increase. If a sin is committed, it should be told to saints. They will pacify it. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)