श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  13.183.57 
यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीयते।
प्रायश्चित्तहतं पापं तथा सद्य: प्रणश्यति॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
जैसे नमक की डली पानी में डालने से तुरंत ही घुल जाती है, वैसे ही तप करने से पाप तुरंत ही नष्ट हो जाता है ॥57॥
 
Just as a lump of salt dissolves when put into water, similarly a sin is instantly destroyed by doing penance. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)