vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण
»
श्लोक 57
श्लोक
13.183.57
यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीयते।
प्रायश्चित्तहतं पापं तथा सद्य: प्रणश्यति॥ ५७॥
अनुवाद
जैसे नमक की डली पानी में डालने से तुरंत ही घुल जाती है, वैसे ही तप करने से पाप तुरंत ही नष्ट हो जाता है ॥57॥
Just as a lump of salt dissolves when put into water, similarly a sin is instantly destroyed by doing penance. ॥ 57॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×