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श्री महाभारत
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अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण
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श्लोक 55
श्लोक
13.183.55
न मां मनुष्या: पश्यन्ति न मां पश्यन्ति देवता:।
पापेनापिहित: पाप: पापमेवाभिजायते॥ ५५॥
अनुवाद
पाप करते समय न तो मनुष्य और न ही देवता मुझे देख सकते हैं।’ ऐसा विचार करके पाप से आवृत पापी मनुष्य पाप योनि में ही जन्म लेता है ॥ 55॥
Neither men nor gods can see me while I am committing sins.' Thinking so, a sinful person covered with sin takes birth in a sinful womb only. ॥ 55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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