श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  13.183.53 
अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत्।
पापमाचक्षते नित्यं हृदयं पापकर्मिण:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
अपने समान, अपने से छोटे अथवा अपने शिष्य को 'तुम' कहकर संबोधित करने में कोई हानि नहीं है। पापी का हृदय उसके पापों को प्रकट कर देता है ॥ 53॥
 
There is no harm in addressing someone who is your equal, younger than you or your disciple as 'you'. The heart of a sinner reveals his sins. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)