श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.183.50 
संस्कृतं पायसं नित्यं यवागूं कृसरं हवि:।
अष्टका: पितृदैवत्या ग्रहाणामभिपूजनम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
देवताओं और पितरों का अष्टका श्राद्ध विधिपूर्वक तैयार की गई खीर, हलवा, खिचड़ी और हविष्य आदि से करना चाहिए। नवग्रहों का पूजन करना चाहिए ॥50॥
 
Ashtaka Shraddha of gods and ancestors should be performed with properly prepared kheer, halwa, khichdi and havishya etc. The nine planets should be worshipped. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)