श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  13.183.48 
सायं प्रातश्च वृद्धानां शृणुयात् पुष्कला गिर:।
श्रुतमाप्नोति हि नर: सततं वृद्धसेवया॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
सायंकाल और प्रातःकाल में वृद्धजन जो कुछ कहते हैं, उसे पूरा सुनना चाहिए। सदैव वृद्धजनों की सेवा करने से शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त होता है ॥48॥
 
One should listen to the entirety of what the elders say in the evening and in the morning. By always serving the elders, one gains knowledge of the scriptures. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)