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mahabharat 13.183.4: धार्मिक विषयों में संदेह उत्पन्न करना सरल है, किन्तु उनका निर्णय करना अत्यन्त कठिन है। प्रत्यक्ष और बुद्धि दोनों का कोई अंत नहीं है। दोनों में ही संदेह उत्पन्न होता है।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 13.183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.183.4 
संशय: सुगमस्तत्र दुर्गमस्तस्य निर्णय:।
दृष्टं श्रुतमनन्तं हि यत्र संशयदर्शनम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
धार्मिक विषयों में संदेह उत्पन्न करना सरल है, किन्तु उनका निर्णय करना अत्यन्त कठिन है। प्रत्यक्ष और बुद्धि दोनों का कोई अंत नहीं है। दोनों में ही संदेह उत्पन्न होता है।॥4॥
 
It is easy to raise doubts in religious matters, but it is very difficult to decide them. There is no end to both direct and intellect. Doubts arise in both.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)