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mahabharat 13.183.36: साधु पुरुष देवताओं, पितरों, भूतों, अतिथियों और परिवारजनों को भोजन कराकर शेष अन्न स्वयं खाता है। वह भोजन करते समय न तो बोलता है और न ही गीले हाथों से सोता है॥ 36॥   |   mahabharat अध्याय 13.183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  13.183.36 
पञ्चानामशनं दत्त्वा शेषमश्नन्ति साधव:।
न जल्पन्ति च भुञ्जाना न निद्रान्त्यार्द्रपाणय:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
साधु पुरुष देवताओं, पितरों, भूतों, अतिथियों और परिवारजनों को भोजन कराकर शेष अन्न स्वयं खाता है। वह भोजन करते समय न तो बोलता है और न ही गीले हाथों से सोता है॥ 36॥
 
A saintly person gives food to the gods, ancestors, ghosts, guests and family members and then eats the remaining food himself. He does not talk while eating and does not sleep with wet hands.॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)