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युधिष्ठिर उवाच
असतां कीदृशं रूपं साधव: किं च कुर्वते।
ब्रवीतु मे भवानेतत् सन्तोऽसन्तश्च कीदृशा:॥ ३३॥
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! तपस्वी का स्वरूप कैसा होता है? पुण्यात्मा पुरुष किस प्रकार के कर्म करते हैं? पुण्यात्मा और तपस्वी कैसे होते हैं? कृपया मुझे यह बताइए।"
Yudhishthira asked, "Grandfather! What is the form of an ascetic? What kind of deeds do virtuous men do? How are virtuous and ascetic? Please tell me this."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥