श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.183.30 
धर्म एव गतिस्तेषामाचार्योपासनाद् भवेत्।
देवलोकं प्रपद्यन्ते ये धर्मं पर्युपासते॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
आचार्य की सेवा करने से मनुष्यों को धर्म का एकमात्र आश्रय प्राप्त होता है और धर्म की पूजा करने वाले मनुष्य स्वर्ग को जाते हैं ॥30॥
 
By serving an Aacharya, men have the sole support of Dharma (religion), and those who worship Dharma go to the heaven. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)