श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  13.183.22 
सदैव भरतश्रेष्ठ मा तेऽभूदत्र संशय:।
अन्धो जड इवाशङ्की यद् ब्रवीमि तदाचर॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! मेरे इस कथन पर तुम्हें कभी संदेह नहीं करना चाहिए। मैं जो कुछ कहूँ, उसे अन्धे और गूंगे की भाँति बिना किसी संदेह के स्वीकार करो और उसके अनुसार आचरण करो। ॥ 22॥
 
O best of the Bharatas! You should never doubt this statement of mine. Whatever I say, accept it without any doubt like a blind and a mute person and act accordingly. ॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)