श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.183.17 
युधिष्ठिर उवाच
पुनरेव हि मे बुद्धि: संशये परिमुह्यति।
अपारे मार्गमाणस्य परं तीरमपश्यत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! मेरी बुद्धि संशय के विशाल समुद्र में डूब रही है। मैं उसे पार करना चाहता हूँ, किन्तु खोजने पर भी मुझे कोई किनारा दिखाई नहीं दे रहा।"
 
Yudhishthira asked, "Grandfather! My intellect is drowning in the vast sea of ​​doubt. I want to cross it, but even after searching I cannot see any shore."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)