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mahabharat 13.183.1: वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रकार सलाह देने पर युधिष्ठिर ने शान्तनुनन्दन भीष्म से पुनः पूछा-॥ 1॥   |   mahabharat अध्याय 13.183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 183: धर्मके विषयमें आगम-प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु-असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.183.1 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति वाक्यं तु कृष्णे देवकिनन्दने।
भीष्मं शान्तनवं भूय: पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रकार सलाह देने पर युधिष्ठिर ने शान्तनुनन्दन भीष्म से पुनः पूछा-॥ 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! On Devkinandan Lord Shri Krishna giving such advice, Yudhishthir again asked Shantanunandan Bhishma - ॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)