श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 181: श्रीकृष्णद्वारा भगवान‍् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.181.42 
नक्षत्राणि गृहाश्चैव दिशोऽथ प्रदिशस्तथा।
विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान‍् परमद्युति:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
नक्षत्र, ग्रह, दिशा, विदिशा भी वही हैं। वह विश्वरूप, अनंत आत्मा, षट्गुण ऐश्वर्य से युक्त और अत्यंत तेजस्वी है। 42॥
 
Nakshatra, Graha, Disha, Vidisha are also the same. He is the universal form, the infinite soul, full of sixfold opulence and extremely brilliant. 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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