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mahabharat 13.181.11-12: जब प्रजापति दक्ष यज्ञ कर रहे थे, तब उनके यज्ञ के आरम्भ में भगवान शंकर क्रोधित हो उठे। उन्होंने निर्भय होकर अपने बाणों से उनके यज्ञ को भेद दिया और अपने धनुष से एक बाण छोड़कर गम्भीर स्वर में गर्जना की। ॥11-12॥   |   mahabharat अध्याय 13.181: श्रीकृष्णद्वारा भगवान‍् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 181: श्रीकृष्णद्वारा भगवान‍् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  13.181.11-12 
प्रजापतेश्च दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ॥ ११॥
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भयस्तु भवस्तदा।
धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जब प्रजापति दक्ष यज्ञ कर रहे थे, तब उनके यज्ञ के आरम्भ में भगवान शंकर क्रोधित हो उठे। उन्होंने निर्भय होकर अपने बाणों से उनके यज्ञ को भेद दिया और अपने धनुष से एक बाण छोड़कर गम्भीर स्वर में गर्जना की। ॥11-12॥
 
When Prajapati Daksha was performing a yajna, Lord Shankar became angry at the commencement of his yajna. Fearlessly, he pierced his yajna with his arrows and released an arrow from his bow and roared in a deep voice. ॥11-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)