Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.180.56: हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार ब्राह्मण की कृपा से मुझे उत्तम फल प्राप्त हुआ है। भीष्मजी मेरे विषय में जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य है॥ 56॥   |   mahabharat अध्याय 13.180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  13.180.56 
एवं व्युष्टिमहं प्राप्तो ब्राह्मणस्य प्रसादजाम्।
यच्च मामाह भीष्मोऽयं तत्सत्यं भरतर्षभ॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार ब्राह्मण की कृपा से मुझे उत्तम फल प्राप्त हुआ है। भीष्मजी मेरे विषय में जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य है॥ 56॥
 
O best of the Bharatas! In this way, I have received the best result by the grace of the Brahmin. Whatever Bhishmaji says about me is all true. ॥ 56॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दुर्वासोभिक्षा नाम एकोनषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १५९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्वासाकी भिक्षा नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)