श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना  »  श्लोक 54-55h
 
 
श्लोक  13.180.54-55h 
इत्यहं रौक्मिणेयस्य पृच्छतो भरतर्षभ॥ ५४॥
माहात्म्यं द्विजमुख्यस्य सर्वमाख्यातवांस्तदा।
 
 
अनुवाद
भारतभूषण! रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्न के पूछने पर मैंने उन्हें विप्रवर दुर्वासा का सारा माहात्म्य इस प्रकार सुनाया। 54 1/2॥
 
Bharatbhushan! When Rukmini Kumar Pradyumna asked, this is how I told him the entire greatness of Vipravar Durvasa. 54 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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