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mahabharat 13.180.52-53h: बेटा! जब मैं घर में गया तो देखा कि ब्राह्मण ने जो कुछ नष्ट किया था या जलाया था, वह सब पुनः अपने मूल रूप में आ गया था ॥52 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना  »  श्लोक 52-53h
 
 
श्लोक  13.180.52-53h 
प्रविष्टमात्रश्च गृहे सर्वं पश्यामि तन्नवम्॥ ५२॥
यद् भिन्नं यच्च वै दग्धं तेन विप्रेण पुत्रक।
 
 
अनुवाद
बेटा! जब मैं घर में गया तो देखा कि ब्राह्मण ने जो कुछ नष्ट किया था या जलाया था, वह सब पुनः अपने मूल रूप में आ गया था ॥52 1/2॥
 
Son! When I entered the house I saw that everything that the Brahmin had destroyed or burnt was restored to its original form. ॥ 52 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)