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श्लोक 13.180.45-47h  |
रुक्मिणीं चाब्रवीत् प्रीत: सर्वस्त्रीणां वरं यश:॥ ४५॥
कीर्तिं चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने।
न त्वां जरा वा रोगो वा वैवर्ण्यं चापि भाविनि॥ ४६॥
स्प्रक्ष्यन्ति पुण्यगन्धा च कृष्णमाराधयिष्यसि। |
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| अनुवाद |
| तब ऋषि ने भी प्रसन्नतापूर्वक रुक्मिणी से कहा - 'शोभने! तुम समस्त स्त्रियों में श्रेष्ठ यश और संसार में श्रेष्ठ कीर्ति प्राप्त करोगी। भामिनी! तुम्हें बुढ़ापा, रोग या कान्तिहीनता आदि स्पर्श नहीं करेगी। तुम पवित्र सुगन्ध से सुगन्धित होकर श्रीकृष्ण का पूजन करोगी। 45-46 1/2॥ |
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| Then the sage also said happily to Rukmini - 'Shobne! You will achieve the best fame among all women and the best fame in the world. Bhamini! You will not be touched by old age, disease or loss of luster etc. You will worship Shri Krishna smelling of holy fragrance. 45-46 1/2॥ |
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