श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.180.33 
आशीविषविषं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णतरो द्विज:।
ब्रह्माशीविषदग्धस्य नास्ति कश्चिच्चिकित्सक:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कहते हैं - विषैले सर्पों का विष बहुत तीक्ष्ण होता है, परन्तु ब्राह्मण का विष उससे भी अधिक तीक्ष्ण होता है। ब्राह्मणरूपी विषैले सर्प द्वारा जलाए गए मनुष्य के लिए इस संसार में कोई चिकित्सक नहीं है॥33॥
 
‘It is said—The venom of poisonous snakes is very sharp, but that of a Brahmin is even more sharp. There is no doctor in this world for one who has been burnt by a poisonous snake in the form of a Brahmin.’॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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