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mahabharat 13.180.31-32: यह महान आश्चर्य देखकर दशार्हवंशी यादव अत्यन्त क्रोधित हो गए। उनमें से कुछ आपस में इस प्रकार कहने लगे - 'भाइयों! इस संसार में केवल ब्राह्मण ही जन्म लें, किसी भी दशा में अन्य जाति का जन्म न हो। अन्यथा इस रथ पर बैठकर इन बाबाजी के अतिरिक्त और कौन जीवित रह सकता था?' (31-32)   |   mahabharat अध्याय 13.180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.180.31-32 
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं दाशार्हा जातमन्यव:।
तत्राजल्पन् मिथ: केचित् समाभाष्य परस्परम्॥ ३१॥
ब्राह्मणा एव जायेरन् नान्यो वर्ण: कथंचन।
को ह्येनं रथमास्थाय जीवेदन्य: पुमानिह॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
यह महान आश्चर्य देखकर दशार्हवंशी यादव अत्यन्त क्रोधित हो गए। उनमें से कुछ आपस में इस प्रकार कहने लगे - 'भाइयों! इस संसार में केवल ब्राह्मण ही जन्म लें, किसी भी दशा में अन्य जाति का जन्म न हो। अन्यथा इस रथ पर बैठकर इन बाबाजी के अतिरिक्त और कौन जीवित रह सकता था?' (31-32)
 
Seeing this great wonder, the Yadavas of Dasharha clan became very angry. Some of them started talking among themselves like this - 'Brothers! Only Brahmins should be born in this world, no other caste should be born under any circumstances. Otherwise, who else other than this Babaji could have sat on this chariot and survived? 31-32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)