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mahabharat 13.180.15: वह पृथ्वी के महानतम पुरुषों से भी ऊँचा था और अपनी इच्छानुसार दिव्य तथा मानवीय लोकों में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण कर सकता था ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 13.180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 180: श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.180.15 
दीर्घेभ्यश्च मनुष्येभ्य: प्रमाणादधिको भुवि।
स स्वैरं चरते लोकान् ये दिव्या ये च मानुषा:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वह पृथ्वी के महानतम पुरुषों से भी ऊँचा था और अपनी इच्छानुसार दिव्य तथा मानवीय लोकों में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण कर सकता था ॥15॥
 
He was taller than the greatest men on earth and could travel freely between the divine and human worlds as per his wish. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)