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mahabharat 13.18.96: 544 लोकपाल:—चतुर्दश भुवन का पालन करनेवाले, 545 आलोक:—संसार से परे, 546 महात्मा—, 547 सर्वपूजित:—सबके द्वारा पूजित, 548 शुक्ल:—शुद्ध स्वरूप, 549 त्रिशुक्ल:—मन, वाणी और शरीर, ये तीनों, 550 संपन्न:—सभी सम्पदाओं से युक्त, 551 शुचि:—सबसे पवित्र, 552 भूतनीसेवित:—सब प्राणियों द्वारा सेवित । 96॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  13.18.96 
लोकपालस्तथालोको महात्मा सर्वपूजित:।
शुक्लस्त्रिशुक्ल: सम्पन्न: शुचिर्भूतनिषेवित:॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
544 लोकपाल:—चतुर्दश भुवन का पालन करनेवाले, 545 आलोक:—संसार से परे, 546 महात्मा—, 547 सर्वपूजित:—सबके द्वारा पूजित, 548 शुक्ल:—शुद्ध स्वरूप, 549 त्रिशुक्ल:—मन, वाणी और शरीर, ये तीनों, 550 संपन्न:—सभी सम्पदाओं से युक्त, 551 शुचि:—सबसे पवित्र, 552 भूतनीसेवित:—सब प्राणियों द्वारा सेवित । 96॥
 
544 Lokpal:—observant of Chaturdash Bhuvan, 545 Alok:—beyond the world, 546 Mahatma—, 547 Sarvapujit:—worshipped by everyone, 548 Shukla:—pure form, 549 Trishukla:—mind, speech and body, these three, 550 Sampanna:—full of all wealth, 551 Shuchi:—the most sacred, 552 Bhootanisevit:—all. Served by creatures. 96॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)