श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  13.18.81 
बहुप्रसाद: सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित्।
वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान् समरमर्दन:॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
422 बहुप्रसाद:—भक्तों पर अधिक दयालु, 423 सुस्वप्न:—सुन्दर स्वप्न देखने वाला, 424 दर्पण:—दर्पण के समान स्वच्छ, 425 अमित्रजित्—बाह्य और आन्तरिक शत्रुओं को जीतने वाला, 426 वेदकर:—वेदों का कर्ता, 427 मन्त्रकार:—मन्त्रों का आविष्कार करने वाला, 428 विद्यान—सर्वज्ञ, 429 समरमर्दन: समरांगण में शत्रुओं का संहार करने वाला । 81॥
 
422 Bahuprasad:—one who is more kind to the devotees, 423 Suswapna:—one who has beautiful dreams, 424 Darpan:—clean like a mirror, 425 Amitrajit—one who conquers external and internal enemies, 426 Vedkar:—doer of the Vedas, 427 Mantrakar:—one who invents mantras, 428 Vidyaan—all-knowing, 429 Samarmardan: One who kills enemies in Samarangana. 81॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)