श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  13.18.74 
वाचस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजित:।
ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी विचारवित्॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
361 वाचस्पत्य:—जो पुरोहित का कार्य करते हैं, 362 वाजसन:—शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा के प्रवर्तक, 363 नित्यमाश्रमपूजित:—जो आश्रमों द्वारा सदैव पूजित हैं, 364 ब्रह्मचारी—ब्रह्म के भक्त, 365 लोकचारी—जो सम्पूर्ण लोकों में विचरण करते हैं, 366 सर्वचारी—जो सर्वत्र भ्रमण करते हैं, 367 विचारवित्त:—विचारों को जानने वाले ॥74॥
 
361 Vachaspatya:—those who work as priests, 362 Vajsan:—originators of the Madhyandini branch of Shukla Yajurveda, 363 Nityamashrampujit:—those who are always worshiped by the ashrams, 364 Brahmachari—devotees of Brahman, 365 Lokchari—those who roam in all the worlds, 366 Sarvchari—those who travel everywhere, 367 Vicharavitta. -Knower of thoughts. 74॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)