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mahabharat 13.18.68: 309 रौद्ररूप:— भयंकर रूप वाले, 310 अंशु:— तेजोमय रूप वाले, 311 आदित्य:— आदितिपुत्र, 312 बहुरश्मि:— असंख्य किरणों वाले, सूर्य रूप, 313 सुवर्चसी— उत्तम कांति से युक्त, 314 वसुवेग:— वायु के समान वेग वाले, 315 महावेग:— वायु से भी अधिक वेग वाले, 316 मनोवेग:— मन के समान वेग वाले, 317 निशाचर: रात में विचरण करने वाले ॥68॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  13.18.68 
रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो बहुरश्मि: सुवर्चसी।
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचर:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
309 रौद्ररूप:— भयंकर रूप वाले, 310 अंशु:— तेजोमय रूप वाले, 311 आदित्य:— आदितिपुत्र, 312 बहुरश्मि:— असंख्य किरणों वाले, सूर्य रूप, 313 सुवर्चसी— उत्तम कांति से युक्त, 314 वसुवेग:— वायु के समान वेग वाले, 315 महावेग:— वायु से भी अधिक वेग वाले, 316 मनोवेग:— मन के समान वेग वाले, 317 निशाचर: रात में विचरण करने वाले ॥68॥
 
309 Raudrarup:—having a fierce form, 310 Anshu:—radiant form, 311 Aditya:—Aditiputra, 312 Bahurashmi:—having innumerable rays, Surya form, 313 Suvarchasi—full of excellent radiance, 314 Vasuvega:—having the same speed as the wind, 315 Mahavega:—more fast than the wind, 316 Manovega:—having the speed like the mind, 317 Nocturnal: Those who wander at night. 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)