Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.18.66-67: 294 मुख्य:—श्रेष्ठ, 295 अमुख:—जिससे बढ़कर कोई नहीं, 296 देह:—शरीर का रूप, 297 कहली:—कहल नामक विशेष वाद्य बजाने वाला, 298 सर्वकामद:—सभी मनोकामनाओं का दाता, 299 सर्वकालप्रसाद:—जो सदैव दयालु रहता है, 300 सुबल:—उत्तम बल से संपन्न, 301 बलरूपध्रुक—बल और रूप का आधार, 302 सर्वकामवरः—सभी इच्छित वस्तुओं में श्रेष्ठ—मोक्षस्वरूप, 303 सर्वदाः—सब कुछ देने वाला, 304 सर्वतोमुख—सभी मुखों वाला, 305 आकाशनिर्विरूपः—जो आकाश के समान नाना प्रकार के रूप प्रकट करते हैं, 306 निपति—जो पापियों को नरक में गिराते हैं, 307 अवशा:—वे जो किसी के नियंत्रण से बाहर हैं, 308 खग:- जो आकाश में उड़ते हैं। 66-67. | mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
294 मुख्य:—श्रेष्ठ, 295 अमुख:—जिससे बढ़कर कोई नहीं, 296 देह:—शरीर का रूप, 297 कहली:—कहल नामक विशेष वाद्य बजाने वाला, 298 सर्वकामद:—सभी मनोकामनाओं का दाता, 299 सर्वकालप्रसाद:—जो सदैव दयालु रहता है, 300 सुबल:—उत्तम बल से संपन्न, 301 बलरूपध्रुक—बल और रूप का आधार, 302 सर्वकामवरः—सभी इच्छित वस्तुओं में श्रेष्ठ—मोक्षस्वरूप, 303 सर्वदाः—सब कुछ देने वाला, 304 सर्वतोमुख—सभी मुखों वाला, 305 आकाशनिर्विरूपः—जो आकाश के समान नाना प्रकार के रूप प्रकट करते हैं, 306 निपति—जो पापियों को नरक में गिराते हैं, 307 अवशा:—वे जो किसी के नियंत्रण से बाहर हैं, 308 खग:- जो आकाश में उड़ते हैं। 66-67.
294 Mukhya:—The best, 295 Amukhya:—He who has no one more important than him, 296 Deha:—The form of the body, 297 Kahli:—One who plays a special musical instrument called Kahal, 298 SarvKamad:—The giver of all desires, 299 SarvaKaalPrasad:—The one who is always kind, 300 Subal:—Endowed with excellent strength, 301 Balrupadhruk—The basis of strength and form, 302 sarvakaamvarah—the best among all desirable things—the form of salvation, 303 sarvadah—the one who gives everything, 304 sarvatomukh—the one with all faces, 305 aakashnirvirupah—those who manifest different types of forms like the sky, 306 nipati—the one who makes sinners fall into hell, 307 Avasha:- those who are beyond anyone's control, 308 Khaga:- those who fly in the sky. 66-67.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥