श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  13.18.65 
लोहिताक्षो महाक्षश्च विजयाक्षो विशारद:।
संग्रहो निग्रह: कर्ता सर्पचीरनिवासन:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
286 लोहिताक्ष:—रक्तमय नेत्रोंवाला, 287 महाक्ष:—बड़े नेत्रोंवाला, 288 विजयाक्ष:—विजयी रथवाला, 289 विशारद:—विद्वान, 290 संग्रह:—संग्रह करनेवाला, 291 निग्रह:—उल्लंघन करनेवालोंको दण्ड देनेवाला, 292 कर्ता:—सबका उत्पादक, 293 सर्पचिरनिवासन:—साँपके समान वस्त्र धारण करनेवाला ॥65॥
 
286 Lohitaksha:—bloody eyes, 287 Mahaksha:—one with big eyes, 288 Vijayaksha:—one with a victorious chariot, 289 Visharad:—scholar, 290 Sangraha:—one who collects, 291 Nigraha:—one who punishes the unruly, 292 Karta—the producer of all, 293 Sarpachiranivasan:—one who wears a snake-like rag. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)