श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.18.45 
दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थ: कृष्ण एव च।
शृगालरूप: सिद्धार्थो मुण्ड: सर्वशुभङ्कर:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
125 दीर्घ:-उच्च कद वाले, 126 हरिकेश:-ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप, 127 सुतीर्थ:-उत्तम तीर्थ रूप, 128 कृष्ण:-सच्चिदानंद रूप, 129 श्रृगाल रूप:-जो सियार का रूप धारण करता है, 130 सिद्धार्थ:-जिसके सभी उद्देश्य सिद्ध होते हैं, 131 मुंड:-मुंडा हुआ सिर वाला, भिक्षु रूप, 132 सर्वशुभंकर: सभी प्राणियों का कल्याण करने वाले। 45॥
 
125 Dirgha:—those of high stature, 126 Harikesh:—Brahma, Vishnu, Mahesh form, 127 Sutirtha:—Uttam Tirtha form, 128 Krishna:—Sachchidananda form, 129 Shrigal form:—One who assumes the form of a jackal, 130 Siddhartha:—Whose all purposes are accomplished, 131 Munda:—With shaved head, Bhikshu form, 132 Sarvashubhankar: One who does good to all living beings. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)