श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  13.18.44 
स्रुवहस्त: सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधि:।
उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
117 श्रुवस्था—जो दसवें हाथ में श्रुव धारण करते हैं, 118 सुरूपः—सुन्दर रूप वाले, 119 तेजः—तेजस्वी, 120 तेजस्करो निधि—जो भक्तों की कांति बढ़ाने वाले, 121 उष्णीशि—जो सिर पर पगड़ी धारण करते हैं, 122 सुवक्त्र—सुन्दर मुख वाले, 123 उदग्रः—तेजस्वी, 124 विनतः—विनयशील । 44॥
 
117 Sruvastha:—one who holds Sruva in the tenth hand, 118 Surupah—one with beautiful appearance, 119 Tej:—resplendent, 120 Tejaskaro Nidhi:—one who increases the radiance of the devotees, 121 Ushnishi—one who wears a turban on the head, 122 Suvaktra:—one with a beautiful face, 123 Udgra:—vigorous, 124 Vinatah – polite. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)