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mahabharat 13.18.32: 13 जति - जटाओं वाला, 14 छम्मि - व्याघ्र चर्म धारण करने वाला, 15 शिखंडी - शिखा वाला, 16 सर्वांग: - सभी अंगों से संपन्न, 17 सर्वभावन: - सबको उत्पन्न करने वाला, 18 हर: - पापी, 19 हरिनाक्ष: - हिरण के समान विशाल नेत्रों वाला, 20 सर्वभूतहर: - सभी भूतों का नाश करने वाला, 21 प्रभु: - स्वामी।   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.18.32 
जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्ग: सर्वभावन:।
हरश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहर: प्रभु:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
13 जति - जटाओं वाला, 14 छम्मि - व्याघ्र चर्म धारण करने वाला, 15 शिखंडी - शिखा वाला, 16 सर्वांग: - सभी अंगों से संपन्न, 17 सर्वभावन: - सबको उत्पन्न करने वाला, 18 हर: - पापी, 19 हरिनाक्ष: - हिरण के समान विशाल नेत्रों वाला, 20 सर्वभूतहर: - सभी भूतों का नाश करने वाला, 21 प्रभु: - स्वामी।
 
13 Jati - the one with matted hair, 14 Chammi - the one who wears the tiger skin, 15 Shikhandi - the one with the crest, 16 Sarvaang: - endowed with all the organs, 17 Sarvbhavan: - the producer of all, 18 Har: - the sinner, 19 Harinaksh: - the one with huge eyes like a deer, 20 Sarvabhuthahar: - the destroyer of all the ghosts, 21 Prabhu: - the master.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)