श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  13.18.31 
स्थिर: स्थाणु: प्रभुर्भीम: प्रवरो वरदो वर:।
सर्वात्मा सर्वविख्यात: सर्व: सर्वकरो भव:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
1 स्थिर:—चंचलता से रहित, मिथ्या और शाश्वत, 2 स्थाणु:—घर के आधारस्तंभ के समान सम्पूर्ण जगत् का आधार, 3 प्रभु:—शक्तिशाली परमेश्वर, 4 भीम:—विनाशकारी होने के कारण भयंकर, 5 प्रवर:—श्रेष्ठ, 6 वरद:—मनचाहा वर देने वाले, 7 वर:—चुने जाने योग्य, 8 सर्वात्मा:—सबकी आत्मा, 9 सर्व विख्यात:—सर्वत्र प्रसिद्ध, 10 सर्व:—विश्वात्मा होने के कारण, 11 सर्वकार:—सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाले, 12 भव:—सबकी उत्पत्ति का स्थान। 31॥
 
1 Sthira:—without fickleness, false and eternal, 2 Sthanu:—the foundation of the entire world like the foundation pillar of the house, 3 Prabhu:—powerful God, 4 Bhim:—terrible because of being destructive, 5 Pravar:—the best, 6 Varad:—the giver of the desired boon, 7 Var:—worthy of being chosen, 8 Sarvatma—soul of all, 9 Sarva Vikhyaat:—famous everywhere, 10 Sarva:—Being the universal soul, 11 Sarvakar:—Creator of the entire world, 12 Bhava:—The place of origin of all. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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