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mahabharat 13.18.181: यह वेदरूपी स्तोत्र स्वर्ग, आरोग्य, आयु और धन प्रदान करने वाला है। यक्ष, राक्षस, दानव, पिशाच, यातुधान, गुह्यक और नाग भी इसमें विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकते। 181॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  13.18.181 
स्वर्ग्यमारोग्यमायुष्यं धन्यं वेदेन सम्मितम्।
नास्य विघ्नं विकुर्वन्ति दानवा यक्षराक्षसा:।
पिशाचायातुधाना वा गुह्यका भुजगा अपि॥ १८१॥
 
 
अनुवाद
यह वेदरूपी स्तोत्र स्वर्ग, आरोग्य, आयु और धन प्रदान करने वाला है। यक्ष, राक्षस, दानव, पिशाच, यातुधान, गुह्यक और नाग भी इसमें विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकते। 181॥
 
This Veda-like hymn bestows heaven, health, longevity and wealth. Even Yaksha, Rakshas, ​​Demon, Vampire, Yatudhan, Guhyak and Naga are not able to create any disturbance in it. 181॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)