Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.18.154-155h: श्री कृष्ण! इस प्रकार अनेक नामों में से श्रेष्ठतम नाम का चयन करके मैंने उसके द्वारा भक्तिपूर्वक भगवान शंकर की स्तुति की। जिसे ब्रह्मा आदि देवता तथा ऋषिगण भी तत्व से नहीं जानते। जो स्तुति के योग्य, पूजनीय तथा वंदनीय हैं, उनकी स्तुति कौन करेगा? 154 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 154-155h
 
 
श्लोक  13.18.154-155h 
यथाप्रधानं भगवानिति भक्त्या स्तुतो मया।
यन्न ब्रह्मादयो देवा विदुस्तत्त्वेन नर्षय:॥ १५४॥
स्तोतव्यमर्च्यं वन्द्यं च क: स्तोष्यति जगत‍्पतिम्।
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! इस प्रकार अनेक नामों में से श्रेष्ठतम नाम का चयन करके मैंने उसके द्वारा भक्तिपूर्वक भगवान शंकर की स्तुति की। जिसे ब्रह्मा आदि देवता तथा ऋषिगण भी तत्व से नहीं जानते। जो स्तुति के योग्य, पूजनीय तथा वंदनीय हैं, उनकी स्तुति कौन करेगा? 154 1/2॥
 
Sri Krishna! In this way, choosing the most important name from among many names, I praised Lord Shankar with devotion through him. Which even the gods like Brahma and the sages do not know from the element. Who will praise Lord Shiva who is worthy of praise, worshipable and worshipable? 154 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)