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mahabharat 13.18.151: 985 अभिराम:—सुखदायक, 986 सुरगण:—देव समुदाय का रूप, 987 विराम:—सबसे श्रेष्ठ, 988 सर्वसाधन:—सब प्रकार से प्राप्त होने योग्य, 989 ललाटकाक्ष:—ललाट में तीसरा नेत्र धारण करने वाले, 990 विश्वदेव:—जो सम्पूर्ण जगत् के साथ क्रीड़ा करते हैं, 991 हरिण:—मृग रूप, 992 ब्रह्मवर्चस:—ब्रह्मतेज से युक्त । 151॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  13.18.151 
अभिराम: सुरगणो विराम: सर्वसाधन:।
ललाटाक्षो विश्वदेवो हरिणो ब्रह्मवर्चस:॥ १५१॥
 
 
अनुवाद
985 अभिराम:—सुखदायक, 986 सुरगण:—देव समुदाय का रूप, 987 विराम:—सबसे श्रेष्ठ, 988 सर्वसाधन:—सब प्रकार से प्राप्त होने योग्य, 989 ललाटकाक्ष:—ललाट में तीसरा नेत्र धारण करने वाले, 990 विश्वदेव:—जो सम्पूर्ण जगत् के साथ क्रीड़ा करते हैं, 991 हरिण:—मृग रूप, 992 ब्रह्मवर्चस:—ब्रह्मतेज से युक्त । 151॥
 
985 Abhiram:—pleasing, 986 Surgan:—the form of the community of gods, 987 Viram:—above all, 988 Sarvasadhan:—achievable by all means, 989 Lalataksh:—one who wears the third eye in the forehead, 990 Vishvadev:—who plays with the entire world, 991 Harin:—deer form, 992 Brahmavarchas:-full of Brahmateja. 151॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)