श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  13.18.150 
गुह: कान्तो निज: सर्ग: पवित्रं सर्वपावन:।
शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामय:॥ १५०॥
 
 
अनुवाद
975 गुह:—कुमार कार्तिकेय स्वरूप, 976 कान्त:—आनन्द के परम स्वरूप, 977 निज: सर्ग:—सृष्टि से अभिन्न, 978 पवित्रम्—परम पवित्र, 979 सर्वपावन:—सबको पवित्र करने वाले, 980 श्रृंगी—सिंगी नामक यंत्र को अपने पास रखने वाले, 981 श्रृंगप्रिय:—पर्वत शिखर को प्रिय, 982 बभ्रु:—विष्णु का रूप, 983 राजराज:—राजाओं के राजा, 984 निरामय:—पूर्णतया दोषरहित । 150॥
 
975 Guh:—Kumar Kartikeya Swarup 976 Kant:—the ultimate form of joy, 977 Nijah Sarga:—integral with the creation, 978 Pavitraam—the most holy, 979 Sarvapaavan:—one who purifies all, 980 Shringi—one who keeps an instrument called Singi with himself, 981 Shringapriya:—one who likes the mountain peak, 982 Babhru:—Vishnu's form, 983 Rajraj:—King of kings, 984 Niramay:—completely flawless. 150॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)