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mahabharat 13.18.15-16: यह सहस्रनाम समस्त पापों का नाश करने वाला तथा चारों वेदों का समन्वय है। मन को वश में करके इसका ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए तथा इसे सदैव अपने मन में धारण करना चाहिए। यह शुभ, पुष्टिकारक, राक्षसों का नाश करने वाला तथा परम पवित्र है।   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  13.18.15-16 
सर्वपापापहमिदं चतुर्वेदसमन्वितम्॥ १५॥
प्रयत्नेनाधिगन्तव्यं धार्यं च प्रयतात्मना।
माङ्गल्यं पौष्टिकं चैव रक्षोघ्नं पावनं महत्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
यह सहस्रनाम समस्त पापों का नाश करने वाला तथा चारों वेदों का समन्वय है। मन को वश में करके इसका ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए तथा इसे सदैव अपने मन में धारण करना चाहिए। यह शुभ, पुष्टिकारक, राक्षसों का नाश करने वाला तथा परम पवित्र है।
 
This Sahasranama destroys all sins and is a combination of all the four Vedas. By controlling the mind, one should try to acquire its knowledge and always keep it in his mind. It is auspicious, nourishing, destroyer of demons and extremely pure.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)